Ghazal #7


आज मन बहुत उदास हो ये ज़रूरी तो नहीं
कोई मेरे आस पास हो ये ज़रूरी तो नहीं
Aaj man bhut udaas ho ye zaroori to nhi
Koi mere aas paas ho ye zaroori to nhiN

बादलों ने आख़िर अपना लहू बरसाया है
बुझ गयी हमारी प्यास हो ये ज़रूरी तो नहीं
badalon ne aakhir apna lahu barsaya hai
Bhujh gyi hamari pyaas ho ye zaroori to nhiN

तेरे ग़म में मेरा जिगर आँखों से बहा है
तेरा ग़म मगर ख़ास हो ये ज़रूरी तो नहीं
Tere gham Mai mera ziagar aakhon se baha hai
Tera gham mgr khaas ho ye zaroori to nhiN

तू, तेरा हाथ, मेरे काँधे पे तेरा सर
सारा जहान पास हो ये ज़रूरी तो नहीं
Tu, tera haath, mere kandhe pe tera sar
Sara zahana paas ho ye zaroori to nhiN


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IIT Guwahati campus has its own ways of thanking you when you spend a night in its lap. I remember that night, a couple of my friends spent the entire night on a bench near this lake, a few of us slept in between on the same bench and when they woke up they saw this beautiful scenery. I was one of them. This Ghazal I wrote just after waking up on the bench near the lake. “…सारा जहान पास हो ये ज़रूरी तो नहीं”

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थोड़ी सी उदासी है

कितना ख़ामोश समां है
थोड़ा सा अंधेरा है
मैं हुं और आसमां है
और थोड़ी सी उदासी है

जो मिल सका मिला है
किसी से न कुछ गिला है
ये मैं हुं वो काफिला है
और थोड़ी सी उदासी है

कुछ सुक़ून मिला है लिख के
कलम के हाथ बिक के
कुछ और देखुं लिख के
क्योंकि थोड़ी सी उदासी है

ज़िद पूरी कर ली सारी
भूली सभी लाचारी
मंज़िल को पा लिया है
पर थोड़ी सी उदासी है

ऐसा ना हो कभी के
तोडू़ं मैं दिल सभी के
तूफान बन ना जाये
जो थोड़ी सी उदासी है

सब ख़त्म कर मैं दूँगा
शायद ख़ुश मैं तब रहूँगा
क्या चाहती है ये जो
थोड़ी सी उदासी है

इस ख़ामोश से समां में
अंधेरे के रास्ते में
मुझे आप कैसे दिख गये
मुझे आप कैसे मिल गये
क्या मेरी तरह भी आपको
थोड़ी सी उदासी है

Ghazal #5


ऐसा है हाल ए दिल के अब रहा नहीं जाता
ज़ब्र ए ज़ब्त तो देखो कि कहा नहीं जाता

और कितनी सांसों की गुंज़ाइश है मुझमें
या ख़ुदा ये दर्द अब सहा नहीं जाता

लाओ भले लहर या फिर सैलाब ले आओ
बहा नहीं जाता तो फिर बहा नही जाता

दूसरी मोहब्बत में होता ही यही है
गले लगाया जाता है चाहा नहीं जाता


ज़ब्र ए ज़ब्त = compulsion of self-control

सैलाब = flood

Ghazal #4


आँसू बहुत हैं तो ये काम कर ही जायेंगे
सहरा तेरे सराबों को हम भर ही जायेंगे
AaNsun bht hai so ye kaam kr hi jaeNge
Sahra tere sairaaboN ko ham bhar hi jaeNge

शोर में तो ख़ैर कब लगता था दिल मेरा
पर ऐसी ख़ामोशी में तो हम मर ही जायेंगे
Shor mai to khair kab lgta tha dil mera
Par esi khamoshi mai to ham mar hi jaeNge

कहना आसमाँ से के वो दर खुला रखे
दश्त से निकलेंगे तो फिर घर ही जायेंगे
Kehna aasmaN se ke wo dar khula rkhe
Dasht se niklege to phr ghar hi jaeNge

और हम से ले भी क्या सकती थी ये दुनिया
हम से दीवनों के तो बस सर ही जायेंगे
Aur ham se le bhi kya skti thi ye duniya
Ham se deewanon k to bas sar hi jaeNge

ऐसे अनासिर से बना है मेरा बदन
जितना भी संभालो मगर बिख़र ही जायेंगे
Na jane kese anasir se bana hai mera badan
Jitna bhi sambhalo magar bikhar hi jaeNge


Sahara= desert

Sarabon = Mirages

Dar= door

Dasht= desert

Anasir= particles

DREAMS


Not in the bright sky
nor in the deep ocean.
Not in the breeze
nor in flames.
Not even in you
nor in myself.
You will find me
on a very bright spot
between the surreality and reality.

You will find me in dreams.

-Abhishek Dixit


Ghazal #3


अपनी वोही रीत आज हमने निभा डाली
नयी पनपती लौ-ए-इश्क़ हमने बुझा डाली

इक ख़्वाब को निचोड़ा और लहू किया जमा
फिर अपने ख़ून-ए-चश्म से तस्वीर बना डाली

बुझने लगी थी आग सो हमने तो यूं किया
कुछ अश्क़ थोड़े ख़्वाब और थोड़ी हवा डाली

इतरा रहा था क़ैस जब दश्त में मिला
हमने भी थोड़ी वहशतें अपनी गिना डाली

मौत तो आनी ही थी पर ग़म रहा मुझे
क्यों ज़िंदगी ज़रूरत से ज़्यादा निभा डाली

पिघली मेरी नज़र उसके बदन पे जब
उसने भी आंखों से खरी खोटी सुना डाली

तेरी याद की हलचल मकान-ए-दिल में रहती थी
कल रात तो सारी फ़सीलें ही गिरा डाली

पहले तो मेरे हाथ से मेरा जाम ले लिया
फिर अपनी आंखों से हमें बेहद पिला डाली

– अभिषेक ‘अमन’


ख़ून-ए-चश्म= blood of eyes
इतरा= was behaving with pride, or arrogance
क़ैस= another name of Manjnu. He is famous for wandering in the desert naked after he went mad in the love of Laila.
दश्त= desert
वहशतें= madness
मकान-ए-दिल = house of heart
फ़सीलें= boundaries, walls