थोड़ी सी उदासी है

कितना ख़ामोश समां है
थोड़ा सा अंधेरा है
मैं हुं और आसमां है
और थोड़ी सी उदासी है

जो मिल सका मिला है
किसी से न कुछ गिला है
ये मैं हुं वो काफिला है
और थोड़ी सी उदासी है

कुछ सुक़ून मिला है लिख के
कलम के हाथ बिक के
कुछ और देखुं लिख के
क्योंकि थोड़ी सी उदासी है

ज़िद पूरी कर ली सारी
भूली सभी लाचारी
मंज़िल को पा लिया है
पर थोड़ी सी उदासी है

ऐसा ना हो कभी के
तोडू़ं मैं दिल सभी के
तूफान बन ना जाये
जो थोड़ी सी उदासी है

सब ख़त्म कर मैं दूँगा
शायद ख़ुश मैं तब रहूँगा
क्या चाहती है ये जो
थोड़ी सी उदासी है

इस ख़ामोश से समां में
अंधेरे के रास्ते में
मुझे आप कैसे दिख गये
मुझे आप कैसे मिल गये
क्या मेरी तरह भी आपको
थोड़ी सी उदासी है

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Ghazal #2


मेरे दिल का जो क़रार था
शायद तुम्हारा ख़ुमाार था

फेहरिश्त-ए-कातिल-ए-जिगर मिली
मेरा नाम उसमें शुमार था

दामन से उलझता रहता था
तन्हा बहुत वो ख़ार था

फूंक डालूंगा मैं दिल की दुनिया
क्या जुनून मुझको सवार था

जिससे मैं झूमता रहता था
मेरे दिल का कोई आज़ार था

बेसाख़्ता अश्कों का सबब
इज़हार नहीं इनकार था

मिली ना राख भी जलने के बाद
मैं इतना नहीं बेकार था

हुई है चूक मेरे कातिल से
वगरना तीर आर पार था

~अभिषेक ‘अमन’


ख़ार= thorn
आज़ार=pain
बेसाख़्ता= spontaneous