Ghazal #3



अपनी वोही रीत आज हमने निभा डाली
नयी पनपती लौ-ए-इश्क़ हमने बुझा डाली

इक ख़्वाब को निचोड़ा और लहू किया जमा
फिर अपने ख़ून-ए-चश्म से तस्वीर बना डाली

बुझने लगी थी आग सो हमने तो यूं किया
कुछ अश्क़ थोड़े ख़्वाब और थोड़ी हवा डाली

इतरा रहा था क़ैस जब दश्त में मिला
हमने भी थोड़ी वहशतें अपनी गिना डाली

मौत तो आनी ही थी पर ग़म रहा मुझे
क्यों ज़िंदगी ज़रूरत से ज़्यादा निभा डाली

पिघली मेरी नज़र उसके बदन पे जब
उसने भी आंखों से खरी खोटी सुना डाली

तेरी याद की हलचल मकान-ए-दिल में रहती थी
कल रात तो सारी फ़सीलें ही गिरा डाली

पहले तो मेरे हाथ से मेरा जाम ले लिया
फिर अपनी आंखों से हमें बेहद पिला डाली

– अभिषेक ‘अमन’


ख़ून-ए-चश्म= blood of eyes
इतरा= was behaving with pride, or arrogance
क़ैस= another name of Manjnu. He is famous for wandering in the desert naked after he went mad in the love of Laila.
दश्त= desert
वहशतें= madness
मकान-ए-दिल = house of heart
फ़सीलें= boundaries, walls

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