Ghazal #1


सन २०१३, इस ब्लॉग की इब्तदा का साल |

तब से अब तक इसने क्या क्या न देखा. किस्से, कहानी, कविताएँ, इंटरव्यू, आर्टिकल, रिव्यु…पर सब एक जुबान में…अंग्रेजी |

हिंदी, उर्दू में लिखा तो खूब पर पहुँचाया किसी को नही, किताब में रखे फूल के मानिंद | पर अब इरादा कर लिया है के अपनी मता-ए-जां आप तक पहुंचायी जाये. और हमने तो…

सुना है उसे भी है शेर-ओ-शा’इरी से शगफ़
सो हम भी अपने मोजिज़े हुनर के देखते है|
– अहमद फ़राज़

तो पेश ए नज़र है एक ग़ज़ल अब्बास ताबिश के शेर के साथ कि

ये जो फूल है हथेली पे उसे फूल न जान
मेरा दिल जिस्म के बाहर भी तो हो सकता है|


नज़र में रहा जिगर में नहीं उतरा
दूरी थी बहुत तो में सफ़र में नही उतरा

थक के चूर है सूरज अँधेरे के सफ़र से
कुछ रोज़ हो गयी है सहर में नही उतरा

हमारी खुश्क आखों ने की तय्यरियाँ बहुत सी
मगर एक भी आंसू नज़र में नही उतरा

सुकून-ए-साहिल से बावस्ता है शायद ये समंदर
नहीं तो क्यों कोई भंवर लहर में नही उतरा

जहाँ देखो वहां आंसू ही आँसू है
क्या कोई फ़रिश्ता इस शहर में नही उतरा

तुम्हारे इश्क़ की कश्ती में थी खराबियां बहुत सी
कश्ती से उतर जाना था मगर मैं नही उतरा

~ अभिषेक ‘अमन’


सहर = सुबह/ morning
खुश्क = dry
सुकून-ए-साहिल = peace of the sea shore
बावस्ता = लगाव

 

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2 thoughts on “Ghazal #1”

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